कैसे कुचला गया नोएडा मजदूर आंदोलन?

ईरान पर अमरीका और इजरायल के हमले के बाद रसोई गैस की किल्लत के कारण उपजे असहनीय हालात में न्यूनतम वेतन बढ़ाने, काम के घंटे घटाने, साप्ताहिक अवकाश और दुगने रेट पर ओवरटाइम की जायज़ मांगों को लेकर कई जगह मज़दूर आंदोलन हुए लेकिन अप्रैल में नोएडा में मजदूर आंदोलन को कैसे उत्तर प्रदेश सरकार ने कुचला उसकी एक बानगी इंडियन एक्सप्रेस की 20 अगस्त की रिपोर्ट से मिलती है।

13 अप्रैल को लगभग 40,000 मजदूरों के सड़कों पर उतरने से बौखलाई सरकार ने सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया, आधा दर्जन से अधिक एफआईआर दर्ज किए जिनमें मजदूरों पर दंगा, आगजनी और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोप लगाए और डेढ़ महीने से अधिक जेल में रखा, जब तक कि अदालतों से उन्हें जमानत न मिल गई। कुछ मामलों में अभी तक जमानत नहीं मिली है और एक पूर्व पत्रकार समेत दो लोगों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून तक लगाया गया है।

यह सब तब जब उत्तर प्रदेश सरकार ने 14 अप्रैल को वेतन वृद्धि की घोषणा की थी। साफ जाहिर है कि अमानवीय कार्य स्थितियों, महंगाई के कारण घर चलाना या जिंदगी की गाड़ी खींचना लगभग असंभव हो जाने के कारण मजदूर सड़कों पर उतरे थे लेकिन पुलिस प्रशासन ने इसे साजिश करार देकर आंदोलन कुचलने का काम किया। 

इंडियन एक्सप्रेस ने 106 गिरफ्तारियों के मामलों की पड़ताल की और पाया कि इन लोगों ने औसतन 53 दिन (न्यूनतम 8 और अधिकतम 120 दिन) जेल बिताये हैं। 

इन गिरफ्तारियों से सात एफआईआर और 222 जमानत आदेश उपजे हैं और 188 लोगों यानी 84 फीसदी को जमानत मिल चुकी है।

आदेशों से पता चलता है कि किसी श्रमिक ने क्या किया, यह सिद्ध करने के बजाय पुलिस भीड़ को ही आरोपी मानती रही।

अदालतों ने कहा, केवल प्रदर्शन स्थल पर मौजूद होना, जमानत देने से मना करने का आधार नहीं हो सकता, ठोस प्रमाण का अभाव आरोपों की गंभीरता पर भारी पड़ता है और विरोध प्रदर्शन में सामान्य श्रमिकों की बराबरी हिंसा भड़काने वालों या आयोजकों से नहीं की जा सकती।

उन मामलों में जमानत देने से मना किया गया है जहां विरोध प्रदर्शन आयोजन, जुटान के आरोप के प्रथम दृष्टया प्रमाण हैं, व्हाट्सएप ग्रुप से लोगों को जुटाना, साज़िश रचना, आंदोलन में शामिल होने के लिए उकसाना, या आगजनी जैसी घटनाओं से सीधे संबंध का आरोप हो।

जिन मामलों में जमानत नहीं दी गई है, उनमें दो में रासुका लगाया गया है। इनमें पत्रकार सत्यम वर्मा शामिल हैं, जिन्हें लखनऊ से गिरफ्तार किया गया। दूसरी, आकृति चौधरी हैं जो दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट हैं। दोनों पर 13 मई को पुलिस ने रासुका लगाने की घोषणा की। 

वर्मा पर “मास्टरमाइंड” होने का आरोप है। पुलिस के अनुसार वह क्रांतिकारी भारतीय मजदूर पार्टी के सदस्य हैं, नई पीढ़ी को बागी संगठन में शामिल होने के लिए “भड़काऊ लेखन” करते हैं और मजदूर बिगुल अखबार के “प्रकाशक और लेखक” हैं।

सत्यम को “आंदोलनजीवी” करार दिया गया है।

वर्मा के वकील ने सत्र न्यायालय में कहा कि उनका कोई अपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, 60 साल के जीवन में कोई अपराधिक आरोप नहीं लगा कभी। उन्हें कैद में रखने से उनके स्वास्थ्य और प्रतिष्ठा को अपूर्णीय क्षति हो रही है।

आकृति चौधरी पर “हिंसक साधनों से अपने उद्देश्य हासिल करने वाली विचारधारा” की समर्थक होने, दिल्ली के करावल नगर में एक सह आरोपी संचालित लाइब्रेरी में शामिल होने और “प्रस्तावित हिंसक आंदोलन की रणनीति” तैयार करने के आरोप हैं। उनके पास “द ग्रेट मार्टियर्स ऑफ इंडियन रिवोल्यूशन” पुस्तक मिलने की बात भी कही गई है, जो पुस्तक उत्तर प्रदेश सरकार के अनुसार “विवादास्पद साहित्य” है। चौधरी पर आरडब्ल्यूपीआई की सदस्य होने, सीएए एनआरसी आंदोलन में शामिल होने और गज़ा विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने के भी आरोप हैं।

सरकार का आरोप है कि आरडब्ल्यूपीआई नोएडा में श्रमिकों के वेतन, दिल्ली में प्रदूषण, मुंबई में एलपीजी कीमतों, गज़ा में फिलिस्तीनी नागरिकों समेत मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन करती रहती है।

उनके वकील ने अदालत को बताया कि आकृति आधुनिक इतिहास में एम ए करने के बाद यूजीसी नेट परीक्षा क्लियर कर चुकी हैं और रिसर्च की तैयारी कर चुकी हैं। झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले गरीब बच्चों को निःशुल्क पढ़ाने समेत समाज सेवा के कार्यों से जुड़ी हैं।

रासुका को चुनौती देती वर्मा की याचिका सुप्रीम कोर्ट में और आकृति की याचिका इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित है।

“साजिश” मामले में आदित्य आनंद, मनीषा चौहान, रूपेश रॉय, सृष्टि गुप्ता और हिमांशु ठाकुर को भी जमानत नहीं मिली है।

इन पर व्हाट्सएप ग्रुप में शामिल होने/एडमिन होने, सह आरोपियों के बयान के आधार पर या मामले की गंभीरता आदि आधारों पर जमानत नहीं दी गई है।

(जनचौक ब्यूरो)

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